अधिकांश अखबार आर.एन.आई, दिल्ली द्वारा डिएक्टीवेट कर दिए गए है प्रकाशकों को इस बारे कोई सूचना नही?
* माजुदा सरकार द्वारा नियमों मे बदलाव कर, लघु समाचार पत्र के सम्पादकों को किया हर सुविधा से वंचित ?


लघु समाचार पत्र चलाना आज के दौर में बेहद कठिन हो गया है, सरकार द्वारा बनाएं गए नियम ना मानने वालों के लिए तो अखबार चलाना बेहद मुश्किल हो गया है आर.एन.आई. द्वारा बनाए गए नियम ना मानने वाले प्रकाशक जो 20-30 साल से अखबार प्रकाशित कर रहे थे। आज उन्हे यह भी नही पता कि उनका अखबार पंजीकृत भी है या नही। लेकिन वे आज भी अखबार प्रकाशित कर रहे है। इसका कारण यह है कि आर.एन.आई. किसी पत्र व्यवहार से प्रकाशक को नही बता रही कि उनका अखबार रदद् हो चुका है या नही। आर.एन.आई. का बेवसाईट पर जानकारी हासिल करना आम व्यक्ति के बस की बात नही है। जबकि आर.एन.आई. अपनी बेवसाईट पर जानकारी ड़ाल कर पल्ला झाड़ रही है। नियमों को ना मानने वाले अखबारों को आर.एन.आई. द्वारा पिछले तीन-चार साल में लाखों की संख्या में डिएक्टीवेट कर दिया गया है या रदद् कर दिया है।
अब अखबार चलाना केवल पुंजीपति लोगो के हाथ में ही रह गया है। कारण यह है कि पुंजीपति सरकार के अधिकारियों से मिलकर अधिकारियों से मोटे विज्ञापन व आर्थिक मदद के नाम पर मोटा पैसा ले सकते है। सरकार का पक्ष छाप कर अधिक से अधिक मुनाफा कमा सकते है। सरकार में कोई अहम पद लेकर और अधिक फायदा उठा सकता है।
इसके विपरित एक आम आदमी जो एक लघु समाचार पत्र चलाना चाहता है उसकी मदद कोन करेगा। अखबार बिकता नही। विज्ञापन मिलते नही। सरकार के नियमों पर वह किसी भी तरह खरा नही उतर सकता है एक अंक छाप कर दुसरे अंक के लिए या तो उसे अपने घर का सामान बेचना पड़ेगा या चोरी करनी पड़ेगी। तभी वह दुसरा अंक छाप पाएगा। ना तो वह सरकार का पक्ष छाप पाएगा ना ही सरकार के खिलाफ। यदि किसी राजनैकित व्यक्ति के पक्ष में खबर छाप दी तो साथी पत्रकार उसे शक की निगाह से देखने लगते है यदि किसी के खिलाफ छाप दी तो केस दर्ज, वकील की फीस, 8-10 साल की हराशमंट गले पड़ जाएगी। बदनामी अलग, अखबार बंद।
किसी के पक्ष में खबर छप जाती है तो कोई धन्यवाद तक नही करता है लेकिन यदि किसी के खिलाफ खबर छप जाती है तो तुरन्त पुलिस में ब्लैकमेल करने की शिकायत दर्ज करवाई जाती है। यहां तक की साल के साल जिनकी खबरें छाप कर चमकाया जाता है वह त्योहार के समय में लघु समाचार पत्र के सम्पादकों, पत्रकारों के फोन तक नही उठाते है यहां तक भी कहां जाता है कि वे विज्ञापन केवल बड़े अखबारों को ही देते है कुछ नेता केवल यह लालच देकर लघु समाचार पत्रों के पत्रकारों से पांच साल खबरें छपवाते है कि चुनाव के समय उन्हे विज्ञापन दिया जाएगा। लेकिन चुनाव में वे पत्रकारों से मिलना तो दुर की बात है उनका फोन तक नही उठाते है। यहां तक कि जनसूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के अधिकारी भी केवल दैनिक समाचार पत्र के सम्पादकों को ही मान्यता देते है लघु समाचार पत्र के पत्रकारों व सम्पादकों को हीनता की नजरों से देखते है। एक जनसूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के अधिकारी ने तो जनसूचना अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी गई जानकारी में यह स्पष्ट कर दिया कि वे केवल दैनिक अखबारों की कटिंग काट कर रखते है लघु समाचार पत्रों को तो वे रिर्काड़ में भी नही रखते है।
आजकल सोशल साईट पर बहुत से अखबारों की पीडीएफ आती है कई लोग कहते है कि यह अखबार तो छपता नही है लेकिन उन्हे यह नही पता की इस पीडीएफ को बनाने में भी रोजाना हजारो रुपये खर्च होते है। तब कही यह पीडीएफ अखबार तैयार होता है। लेकिन उन पी.डी.एफ समाचार पत्रों के सम्पादकों को यह नही पता कि उनके अखबार पंजीकरण करवाने के बाद अखबार की प्रति आर.एन.आई., पी.आई.बी व सरकार को भेजनी जरुरी होती है आर.एन.आई. के नियमानुसार अखबार की प्रति 48 घंटे के अंदर आर.एन.आई. या पी.आई.बी कार्यालय में भेजनी आवश्यक है अन्यथा 50 रुपये प्रति अंक का जुर्माना आपसे विभाग वसूल कर लेगा। अब तो ये हालात है कि यदि आप अखबार को नियमित चला सकते है तो अखबार पंजीकृत करवाएं। अन्यथा आप केवल सरकार/विभाग को जुर्माने की रकम अदा करने में ही रहेंगे।
प्रदेश सरकारों ने भी नियम इतने अधिक कड़़े कर दिए है कि केवल पुजीपतियों के दैनिक अखबार के प्रकाशक या उनके पत्रकार ही सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं का फायदा उठाएगें। लघु समाचार पत्र वाले केवल सरकार के मुंह की तरफ देखते रहेंगे। इसका फायदा माजुदा सरकारे उठाएंगी। पंुजीपति अखबार में सरकार के खिलाफ लिखेंगे नही। लोकल अखबार वाला लिख नही सकता। क्योंकि एक तरफ तो आर्थिक तंगी दुसरी और 8-10 साल की हराशमंटए बदनामी साथ में फ्री में। अतः अखबार चलाना, अब खाला जी का घर नही रह गया है। अब पुंजीपति ही अखबार चला पाएंगे। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ आज अपनी कलम के साथ समझौता कर रहा है।