सविधान में है मूलभूत अधिकार- यानी बोलने की, लिखने की, चलने-फिरने, पहनने की और संगठन-पार्टी खड़ा करने की व् मीडिया चलाने की आज़ादी : कटारिया

  •  सविधान दिवस पर इंटरनैशनल बेबीनार को सूरजभान कटारिया ने किया सम्बोधित   



संजीव बंसल/समय की ताकत 
कुरुक्षेत्र, केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार के सदस्य एवं वरिष्ठ भाजपा नेता सूरजभान कटारिया ने कहा है की भारतीय संविधान ‘‘भारतवर्ष को समता-स्वतंत्रता-बंधुत्व के एक सूत्र में बांधने वाला सामाजिक क्रान्ति का दस्तावेज है और सभी देशवासिओ को सविधान दिवस पर्व के रूप में मनाना चाहिए"  भारतीय संविधान के निर्माता, सामाजिक न्याय के पुरोधा, क्रांन्तिकारी डॉ भीमराव आंबेडकर को सिर्फ शोषित, वंचित, पिछड़ो के नेता तक ही सीमित करना जातिगत मानसिकता का परिचायक है | उन्होंने कहा की आज हमें अगर कहीं भी खड़े होकर अपने विचारों की अभिव्यक्ति करने की आजादी है,समानता का अधिकार है तो यह डॉ आंबेडकर जी के संघर्षों से मुमकिन हो सका है भारत वर्ष का जनमानस सदैव उनका कृतज्ञ रहेगा!
         कटारिया ने आज सविधान दिवस पर आयोजित इंटरनैशनल बेबीनार में अपने कुरुक्षेत्र आवास से कहा की सविधान ने आधुनिक भारत देश को दी नई दिशा प्रदान की जिससे भारत वर्ष में जो सामाजिक क्रांति आई और आर्थिक और सामाजिक गैरबराबरी के ख़ात्मे को राष्ट्रीय एजेंडे के रूप में सामने लाए! उन्होंने कहा की  भारतीय संविधान नहीं होता तो लोगो के मूलभूत अधिकारों की गारंटी भी न होती, यानी बोलने की, लिखने की, चलने, फिरने, पहनने की और अपनी मर्ज़ी से व्यवसाय चुनने की, संगठन-पार्टी खड़ा करने की, मीडिया चलाने की आज़ादी नहीं होती और सबसे महत्वपूर्ण जातिगत भेदभाव को गलत नहीं माना जाता, छुआछूत को कानून में अपराध घोषित नहीं किया जाता, स्त्री स्वतंत्रता की बात स्वपन बनकर रह जाती! सूरजभान कटारिया ने कहा कि डॉ आंबेडकर ने उस समय जिन चुनौतियों को राष्ट्र निर्माण में भावना  के साथ देश यह संविधान सभा के आख़िरी भाषण में कहा था कि संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो वह अपने आप लागू नहीं होता है, उसे लागू करना पडता है। ऐसे में जिन लोगो के ऊपर संविधान लागो करने की जिम्मेदारी होती है, यह उन पर निर्भर करता है कि वो संविधान को कितनी इमानदारी और प्रभावी ढंग से लागू करते है|