सादुल्लानगर/बलरामपुर = हाथरस में लड़की दलित थी।
बलरामपुर में भी लड़की दलित थी ।हाथरस में पोस्टमार्टम रिपोर्ट और फॉरेंसिक जांच में दुष्कर्म की पुष्टि नहीं हुई I
बलरामपुर में पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि हुई। आरोपित ने हत्या का अपराध स्वीकारा । लड़की की चप्पल भी आरोपित की बताई जगह से बरामद हुई I
फिर हाथरस और बलरामपुर को लेकर अन्याय क्यों ?
हाथरस में हंगामा बरपा हो गया Iलोकतंत्र नष्ट होने लगा। देश और समाज खतरे में पड़ गए Iधरना प्रदर्शन की बाढ़ आ गईI एसआईटी जांच के बाद नौबत सीबीआई तक जा पहुंची ।सीबीआई ने कमान संभाल ली ।राजनीति सक्रिय हो गई ।सुशांत सिंह केस से फुर्सत हो गई । सोशल मीडिया और टीवी के शरलॉक होम्स कुचाले मारने लगेI न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ा ।बात की बात में हाथरस का बूलगढ़ी गांव पीपली लाइव हो गया एक अनचाहे कारों से मशहूर हो गया।
बलरामपुर में चिड़िया न फटकी दो-चार कुर्ते पजामे पहुंचे ।लेकिन फिर लौटे तो ऐसे ही पलटे ही नहीं।
लखनऊ लपका ना दिल्ली दौड़ीI एनजीओ जागे ना नेता भागे। नियत हंसी और बलरामपुर से लखनऊ तक 165 किलोमीटर आते-आते दुष्कर्म और हत्या की यह वारदात दम तोड़ गई। बीए में पढ़ने वाली एक लड़की जो कॉलेज फीस जमा करके घर लौट रही थी 8 समय काल के गाल में विलीन हो गई।
दो सामान अपराधों में ऐसा दोहरा चरित्र क्यों ?
बलरामपुर में दुष्कर्म कानूनन प्रमाणित है और यह भी कि लड़की के शरीर पर 10 घाव थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि एक जगह तो हमदर्दी का तूफान उमड़ पड़ा। जबकि दूसरी जगह घड़ियाल ब्रांड आंसू भी ना निकले। दो सामान विधाओं में भेद क्यों किया गया ?
बेटियों में यह अंतर क्यों किया गया ?
क्यों हाथरस में आरोपित और उनके परिवार अपनी नारको और केस की सीबीआई जांच कराना चाहते हैं जबकि बलरामपुर में ऐसी कोई मांग नहीं हुई। बलरामपुर में हैवानियत का शिकार होने वाली लड़की का परिवार क्या खून के आंसू नहीं रो रहा है?
इस भेदभाव का कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं दिखता। सिवा इसके कि हाथरस कांड में कुख्यात के तीन कारक तीन शब्द दलित, दुष्कर्म और सवर्ण I सभी आरोपित सवर्ण और सवर्णो में भी ठाकुर है I उपचुनाव सामने है। लिहाजा राजनीति में जातियों की पतंग तान दी है। इसके विपरीत बलरामपुर दुष्कर्म की वारदात क्या इसलिए नेपथ्य में चली गई। क्योंकि वहां आरोपित अल्पसंख्यक है । हाथरस मैं विपक्ष का जाना सर्वथा उचित है। सट्टा बच्चे तो अपने विरोध प्रदर्शन करने से रहा । लोकतंत्र में विपक्ष का काम ही धरना प्रदर्शन है। लोकतंत्र में विपक्ष सबसे अहम स्कतनलिका हैI सरकार को सही दिशा दिखाना और इसके लिए सभी मर्यादित उपाय करना ही विपक्ष का काम है I सड़क का संघर्ष ही पार्टियों को मजबूत बनाता है। उनसे यही अपेक्षित है। परंतु जब जात धर्म के आधार पर भेदभाव करने लगे तो विपक्ष कटघरे में आता है । हाथरस जाना चाहिए लेकिन बलरामपुर भी जाना चाहिए था। हाथरस को लेकर पक्ष विपक्ष लड़ते-लड़ते लेकिन विचारों की यही टक्कर बलरामपुर में भी होनी चाहिए थी हाथरस होगा दिल्ली से नजदीक लेकिन कारों में बलरामपुर तक जाने का भी डीजल पढ़ना चाहिए था । हाथरस और बलरामपुर में कानून अपना काम कर रहा है। कानून की धाराएं ट्विटर की धाराओं से निष्कर्ष नहीं निकालेंगी I
दोनों बेटियां थी। दोनों के साथ अमानवीय व्यवहार व्यवहार हुआ। दोनों के दोषियों को कठोर दंड मिलना चाहिएI लेकिन राजनीति और समाज को भी दोनों बेटियों से एक का व्यवहार करना चाहिए था॥